हनुमान चालीसा कैसे सिद्ध करें !

श्री हनुमान चालीसा, चालीस मन्त्रों का एक जाग्रत शक्तिपुञ्ज है। इसे सिद्ध करने की चालीस विधियां हैं, परन्तु सामान्यतया चार प्रकार की विधियाॅ ही गृहस्थों के लिए उपयोगी हैं। शेष विधियां उग्र प्रयोग हैं और तान्त्रिको के लिये ही वैध हैं। इन उग्र प्रयोगों से प्राण भी संकट में पड़ सकते हैं तथा इन्हें सिद्ध करना भी काफी कष्टकारक होता है। साधना में थोड़ी सी भी ऊॅच-नीच होने से तत्क्षण, आसन पर बैठे ही बैठे, भयानक दण्ड मिलता है। अतः निवेदन करूंगा कि यदि कहीं से भी उग्र प्रयोग की प्राप्ति हो भी जाय तो प्रणाम सहित अस्वीकार कर दें।


चार प्रकार की विधियों में पहली विधि है १०८ बार श्री हनुमान चालीसा की संकल्प सहित आवृत्ति। इसके लिये पूजास्थल पर बैठ कर, अपने समक्ष एक काठ की चौकी पर लाल आसन बिछाकर श्री हनुमानजी का चित्र रखें और मुद्रा का प्रदर्शन करते हुए आवाहन, स्थापन करें। फिर अर्घ्य, पाद्य, आचमन आदि करते हुये पञ्चोपचार पूजन करें। संकल्प करते समय ही यह कहें कि मैं अमुक कार्य की सिद्धि के लिए श्री हनुमान चालीसा की शतावृत्ति कर रहा हूं।

अब, अपने समक्ष श्री हनुमानजी को बैठा हुआ जान कर, श्री हनुमान चालीसा का पाठ करना प्रारम्भ करें और १०८ बार की आवृत्ति पूर्ण होने तक रूकें नहीं। ध्यान रखें कि मन इधर उधर न भटके और बीच में उठना न पड़ जाय। पाठ को छोड़कर, बीच में लघुशंका इत्यादि के लिए उठ जाने से साधना खण्डित हो जाएगी और आपका संकल्प टूट जाएगा। पाठ करने में कोई जल्दबाजी भी न करें। स्थिर बुद्धि से, श्रद्धापूर्वक की गई यह साधना शत-प्रतिशत फलदाई होती है। यह साधना, सर्वाधिक निरापद साधना है। कुछ त्रुटियां हो जाने पर भी विपरीत फल नहीं मिलता। हाॅ, पूर्ण फल नहीं मिलेगा।

दूसरी साधना है जो चालीस दिनों की है। इसमें भी सारी प्रक्रियाएं पूर्ववर्ती साधना की तरह ही रहेंगी‌। अन्तर केवल इतना होगा कि यह ४० दिनों तक चलेगी और प्रतिदिन ११ आवृत्तियां होंगी।

तीसरी साधना में हनुमान चालीसा के एक एक दोहे पर एक एक आहुतियां देनी पड़ती हैं। इस साधना में दोहे का उच्चारण करते हुये हवन करना होता है और इस प्रकार ११,२१ या ४० दिनों की साधना होती है। आहुति के द्रव्य का निर्धारण, आपकी मनोकामना के आधार पर किया जाता है।

चौथी साधना को , बहती हुई नदी के, कमर पर्यन्त, जल में खड़े होकर किया जाता है। यह साधना तब तक की जाती है जब तक ईष्ट की पूर्ति न हो जाय। कार्य पूर्ण होने पर उसी नदी के तट पर हवन करके, ब्राह्मणों को भोजन कराते हुये, दक्षिणा आदि से सन्तुष्ट करना चाहिए और हनुमानजी के मन्दिर में जाकर दर्शन-पूजन करते हुए, उनकी अनवरत कृपा के लिए प्रर्थना करनी चाहिए। नदी न मिले तो हनुमान जी के मन्दिर में भी यह साधना की जा सकती है।

इन चारों साधनाओं का परिणाम सदैव ही अच्छा मिलता है और ये निरापद भी हैं।