तुलसी जी के विवाह का महत्व, विधि एवं पौराणिक कथा!

देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह का विधान है। जिसमें भगवान शालिग्राम और देवी तुलसी की विवाह किया जाता है। देवोत्थान एकादशी पर तुलसी विवाह करने से भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की  विशेष कृपा प्राप्त होती है।
Tulsi vivah ki vidhi
कार्तिक माह की एकादशी की शाम को घर की महिलाएं भगवान विष्णु के रूप शालिग्राम और विष्णुप्रिया तुलसी का विवाह संपन्न करवाती हैं। विवाह परंपरा के अनुसार घर के आंगन में गन्ने से मंडप बनाकर तुलसी से शालिग्राम के फेरे किए जाते हैं। इसके पश्चात सामान्य विवाह की भांति विवाह गीत, भजन व तुलसी नामाष्टक सहित विष्णुसहस्त्रनाम के पाठ किए जाने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार तुलसी-शालिग्राम विवाह कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है और दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है।

तुलसी विवाह की विधि
● परिवार के सभी सदस्‍य और विवाह में शामिल होने वाले सभी अतिथि नहा-धोकर व अच्छे कपड़े पहनकर तैयार हो जाएं।
● जो लोग तुलसी विवाह में कन्‍यादान कर रहे हैं उन्‍हें व्रत रखना आवश्यक है।
● शुभ मुहूर्त के समय तुलसी के पौधे को आंगन में पटले पर विराजमान करें।
● आप चाहें तो छत या मंदिर स्थान पर भी तुलसी विवाह किया जा सकता है।
● अब एक अन्‍य चौकी पर शालिग्राम जी को विराजित करें। साथ ही चौकी पर अष्‍टदल कमल बनाएं। 
● एक कलश में जल भरकर उसके ऊपर स्‍वास्तिक बनाएं और आम के पांच पत्ते वृत्ताकार रखें तथा अब एक लाल कपड़े में नारियल लपेटकर आम के पत्तों के ऊपर रखें। इस कलश को भी चौकी पर स्थापित करें।
● तुलसी के गमले पर गेरू लगाएं. साथ ही गमले के पास जमीन पर गेरू से रंगोली भी बनाएं।
● अब तुलसी के गमले को शालिग्राम की चौकी के दाईं ओर स्‍थापित करें।
● अब तुलसी के आगे घी का दीपक जलाएं।
● इसके बाद गंगाजल में फूल डुबोकर "ऊं तुलसाय नम:" मंत्र का जाप करते हुए गंगाजल का छिड़काव तुलसी पर करें।
● फिर गंगाजल का छिड़काव शालिग्राम जी पर करें।
● अब तुलसी को रोली और शालिग्राम जी को चंदन का टीका लगाएं।    
● तुलसी के गमले की मिट्टी में ही गन्‍ने से मंडप बनाएं और उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक लाल चुनरी ओढ़ाएं।
● इसके साथ ही गमले को साड़ी को लपेटकर तुलसी को चूड़ी पहनाकर उनका श्रृंगार करें।
● अब शालिग्राम जी को पंचामृत से स्‍नान कराकर पीला वस्‍त्र पहनाएं। 
● तुलसी और शालिग्राम जी की हल्दी करें, इसके लिए दूध में हल्दी भिगोकर लगाएं।
● गन्ने के मंडप पर भी हल्दी का लेप लगाएं।
● अब पूजन करते हुए इस मौसम आने वाले फल जैसे बेर, आवंला, सेब आदि चढ़ाएं।
● अब शालिग्राम जी को चौकी समेत हाथ में लेकर तुलसी की सात परिक्रमा कराएं. घर के किसी पुरुष सदस्‍य को ही शालिग्राम जी की चौकी हाथ में लेकर परिक्रमा करनी चाहिए।
● इसके बाद तुलसी को शालिग्राम जी के बाईं ओर स्‍थापित करें।  
● आरती उतारने के बाद विवाह संपन्‍न होने की घोषणा करें और वहां मौजूद सभी लोगों में प्रसाद वितरण करें।
● तुलसी और शालिग्राम जी को खीर और पूरी का भोग लगाया जाता है।
● तुलसी विवाह के समय मंगल गीत भी गाएं।

तुलसी जी के विवाह की की पौराणिक कथा :
जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर था, जिसका विवाह वृंदा नाम की कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी और पतिव्रता थी। इस से कारण जलंधर अजेय हो गया। अपने अजेय होने पर जलंधर को अभिमान हो गया और वह स्वर्ग की कन्याओं को सताने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे।
भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का ज्ञान हुआ तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का श्राप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। 
परन्तु भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे, अतः वृंदा के श्राप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।
भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई। वृंदा की राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी घटना को स्मरण रखने हेतु प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देव प्रबोधनी एकादशी के अवसर पर तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कराया जाता है।
शालिग्राम पत्थर गंडकी नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी. तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य सम्मिलित की जाती है बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।
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