आस माता की कहानी, व्रत, पूजा और उद्यापन !

आस माता का व्रत फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अष्टमी तिथि तक किसी किया जा सकता है।
Aas mata ki kahani

आस माता का व्रत कैसे करें?
यह व्रत फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी तिथि के बीच किसी भी दिन अपनी सुविधानुसार रखें।
 व्रत के दिन आस माता की कथा अवश्य सुननी चाहिए।
 एक लकड़ी का पटला (पाटा) लें और उस पर एक जल का लोटा रखें।
उसी लोटे पर रोली से एक सतिया (स्वास्तिक) बनायें।
 फिर अक्षत (चावल) और पुष्प अर्पित करें।
 दायें हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर आस माता की कथा सुनें। (कथा इसी अंक में दी गई है।)
 बायना निकाले जिसमें सूजी का हलवा, सात पूरी और रुपये हों।
 यह बायना अपनी सास को देना चाहिए और देते समय उनके चरण स्पर्श अवश्य करें। बाद में स्वयं भोजन कर लें।
 ऐसा माना जाता है कि यदि किसी के घर पुत्र का जन्म हो या उसकी शादी होने जा रही हो तो आस माता का उद्यापन करना चाहिए। इसमें सात जगह चार चार पूरी और हलवा रखना चाहिए।

आस माता की कथा : 
एक आसलिया नामक व्यक्ति था । वह जुआ खेला करता था और वह हारे या जीते पर ब्राह्मण को भोजन करवाता था। एक दिन उसकी भाभियाँ बोली कि तुम तो हारो या जीतो, दोनों पर ब्राह्मण जिमाते हो, ऐसे कब तक चलेगा? और ऐसा कहकर उसे घर से निकाल दिया । वह घर से निकलकर नगर में चला गया और आस माता की पूजा करने बैठ गया । 
धीरे धीरे सारे नगर में यह समाचार फैल गया कि एक जुऐ का बहुत अच्छा खिलाड़ी आया है तो यह सुनकर उस नगर के राजा ने उसे जुआ खेलने के लिए बुलाया। राजा जुए में सारा राज पाट हार गया ।
अब आसलिया राजा बन गया और राज करने लगा। भाभियों के घर में अन्न की कमी पड़ गई और इसलिए वह उसे ढूंढने निकल गई और ढूंढते ढूंढते सब उसी नगर में पहुंच गए। वहाँ उन्होंने सुना कि एक व्यक्ति जुए में राजा से जीत गया। तब भाभियां और उसकी मां उससे मिलने के लिए गए। वहां उसकी माँ ने उससे कहा कि मेरा बेटा भी यहीं पर जुआ खेलता है, हमने उसको घर से निकाल दिया था। 
तब राजा ने कहा - माताजी मैं ही तुम्हारा बेटा हूं तुम्हारी करनी तुम्हारे साथ मेरी करनी मेरे साथ! 
फिर आसलिया ने अपने परिवार के साथ अपने देश जाकर आस माता का उजमन करा दिया और सुख से राज्य करने लगा। हे आस माता जैसा आसलिया राजा को राजपाट दिया वैसा सबको देना।